Top Famous Sher of Jaun Eliya in Hindi Font

मैं जो हूँ 'जौन-एलिया' हूँ जनाब
इस का बेहद लिहाज़ कीजिएगा।।
~ Jaun

Mai jo hun jaun eliya hun janab
Iska behad lihaz kijiyega

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मिल रही हो बड़े तपाक के साथ
मुझ को यकसर भुला चुकी हो क्या।।

Mil rahi ho bade tapak ke sath
Mujhko yaksar bhula chuki ho kya

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मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को।।

Meri bahon me bahakane ki saza bhi sun le
Ab bahut der me aazad karunga tujhko

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पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें
ज़मीं का बोझ हल्का क्यूँ करें हम।।

Padi rahne do insano ki lashen
Zameen ka bojh halka kyun karen ham

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मिल कर तपाक से न हमें कीजिए उदास
ख़ातिर न कीजिए कभी हम भी यहाँ के थे।।

Mil kar tapak se na hamen kijiye udaas
Khatir na kijiye kabhi ham bhi yahan ke the

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फिर उस गली से अपना गुज़र चाहता है दिल
अब उस गली को कौन सी बस्ती से लाऊँ मैं।।

Fir usi gali se apna guzar chahata hai dil
Ab us gali ko kaun si basti se laun main

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मुझ को आदत है रूठ जाने की
आप मुझ को मना लिया कीजे।।

Mujhko aadat hai rooth jane ki
Aap mujh ko mana liya keeje

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मेरी हर बात बे-असर ही रही
नक़्स है कुछ मिरे बयान में क्या।।

Top Sher of Jaun Eliya


तिरी क़ीमत घटाई जा रही है
मुझे फ़ुर्क़त सिखाई जा रही है।।

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ख़र्च चलेगा अब मिरा किस के हिसाब में भला
सब के लिए बहुत हूँ मैं अपने लिए ज़रा नहीं।।

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ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी
मैं भी बर्बाद हो गया तू भी।।

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उस ने गोया मुझी को याद रखा
मैं भी गोया उसी को भूल गया।।

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उस गली ने ये सुन के सब्र किया
जाने वाले यहाँ के थे ही नहीं।।

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मैं इस दीवार पर चढ़ तो गया था
उतारे कौन अब दीवार पर से।।

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बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है।।

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इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ
वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने।।

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क्या कहा इश्क़ जावेदानी है!
आख़िरी बार मिल रही हो क्या।।

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क्या सितम है कि अब तिरी सूरत
ग़ौर करने पे याद आती है।।

Best Shayari of Jaun Eliya


बोलते क्यूँ नहीं मिरे हक़ में
आबले पड़ गए ज़बान में क्या।।

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इन लबों का लहू न पी जाऊँ
अपनी तिश्ना-लबी से ख़तरा है।।

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और तो क्या था बेचने के लिए
अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं।।

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काम की बात मैं ने की ही नहीं
ये मिरा तौर-ए-ज़िंदगी ही नहीं।।

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तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो।।

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जाते जाते आप इतना काम तो कीजे मिरा
याद का सारा सर-ओ-सामाँ जलाते जाइए।।

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कौन इस घर की देख-भाल करे
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है।।

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गो अपने हज़ार नाम रख लूँ
पर अपने सिवा मैं और क्या हूँ।।

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे।।


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घर से हम घर तलक गए होंगे
अपने ही आप तक गए होंगे।।

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किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो।।

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गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने।।

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एक ही तो हवस रही है हमें
अपनी हालत तबाह की जाए।।

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कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया।।

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क्या है जो बदल गई है दुनिया
मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ।।

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एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई।।

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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम
बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम।।

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ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं
शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं।।

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तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह
आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं।।

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जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है।।

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जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना
वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था।।

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जानिए उस से निभेगी किस तरह
वो ख़ुदा है मैं तो बंदा भी नहीं।।

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चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र
अब वो कपड़े बदल रही होगी।।

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क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं।।

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कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा।।

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कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे।।

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कल का दिन हाए कल का दिन ऐ 'जौन'
काश इस रात हम भी मर जाएँ।।

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उस के होंटों पे रख के होंट अपने
बात ही हम तमाम कर रहे हैं।।

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अपने सर इक बला तो लेनी थी
मैं ने वो ज़ुल्फ़ अपने सर ली है।।

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अपने सब यार काम कर रहे हैं
और हम हैं कि नाम कर रहे हैं।।

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अब तुम कभी न आओगे यानी कभी कभी
रुख़्सत करो मुझे कोई वादा किए बग़ैर।।

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अब तो उस के बारे में तुम जो चाहो वो कह डालो
वो अंगड़ाई मेरे कमरे तक तो बड़ी रूहानी थी।।

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अब मिरी कोई ज़िंदगी ही नहीं
अब भी तुम मेरी ज़िंदगी हो क्या।।

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आख़िरी बात तुम से कहना है
याद रखना न तुम कहा मेरा।।

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आज मुझ को बहुत बुरा कह कर
आप ने नाम तो लिया मेरा।।

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आईनों को ज़ंग लगा
अब मैं कैसा लगता हूँ।।

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मुझ को तो कोई टोकता भी नहीं
यही होता है ख़ानदान में क्या।।

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मुझ को ये होश ही न था तू मिरे बाज़ुओं में है
यानी तुझे अभी तलक मैं ने रिहा नहीं किया।।

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मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या।।

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मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से।।

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याद आते हैं मोजज़े अपने
और उस के बदन का जादू भी।।

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यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे।।

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ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ता
एक ही शख़्स था जहान में क्या।।

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ये वार कर गया है पहलू से कौन मुझ पर
था मैं ही दाएँ बाएँ और मैं ही दरमियाँ था।।

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यूँ जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या।।

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है वो बेचारगी का हाल कि हम
हर किसी को सलाम कर रहे हैं।।

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हम हैं मसरूफ़-ए-इंतिज़ाम मगर
जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं।।

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हम को यारों ने याद भी न रखा
'जौन' यारों के यार थे हम तो।।

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हम यहाँ ख़ुद आए हैं लाया नहीं कोई हमें
और ख़ुदा का हम ने अपने नाम पर रक्खा है नाम।।

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मैं शाम ओ सहर का नग़्मा-गर था
अब थक के कराहने लगा हूँ

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कल पर ही रखो वफ़ा की बातें
मैं आज बहुत बुझा हुआ हूँ ।।

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रोया हूँ तो अपने दोस्तों में
पर तुझ से तो हँस के ही मिला हूँ।।

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सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं।।

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सब मेरे बग़ैर मुतमइन हैं
मैं सब के बग़ैर जी रहा हूँ।।

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शायद वो दिन पहला दिन था पलकें बोझल होने का
मुझ को देखते ही जब उस की अंगड़ाई शर्माई है।।

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शब जो हम से हुआ मुआफ़ करो
नहीं पी थी बहक गए होंगे।।

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सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है।।

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वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँ करें हम।।

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वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे।।

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हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना पुराने हो गए हैं
कि उस गली में गए अब ज़माने हो गए हैं।।

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हमारी ही तमन्ना क्यूँ करो तुम
तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँ करें हम।।

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क्या है जो बदल गई है दुनिया
मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ ।।

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हर शख़्स से बे-नियाज़ हो जा
फिर सब से ये कह कि मैं ख़ुदा हूँ।।

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हो कभी तो शराब-ए-वस्ल नसीब
पिए जाऊँ मैं ख़ून ही कब तक।।

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हो रहा हूँ मैं किस तरह बर्बाद
देखने वाले हाथ मलते हैं।।

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हुस्न कहता था छेड़ने वाले
छेड़ना ही तो बस नहीं छू भी।।

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बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या।।

Hisab Mat Karna Mera Mai Behisab Likhta Hu - Kavita By Ashish Awasthi

हिसाब मत करना मेरा, मैं बेहिसाब लिखता हूं
तुम रातों की फिक्र करो, मैं बस ख्वाब लिखता हूं

जज़्बातों को बुला कर इक साज़िश लिखता हूं
फिर लफ़्ज़ों से मिल कर उसी का राज़ लिखता हूं

इज़हार, इनकार तो कभी दास्तान-ए-इकरार लिखता हूं
पढ़ता हूं निगाहों को फिर किस्सा-ए-रुख़सार लिखता हूं

कभी फ़लक पे जाके सितारों की बारात लिखता हूं
फिर मिल के जुगनुओं से उनकी भी बात लिखता हूं

कभी इश्क़ की सहर, कभी हिज़्र की रात लिखता हूं
पिला के स्याही क़लम को फिर मैं शराब लिखता हूं

सोचता हूं दिन भर फिर इक दिलनशीं शाम लिखता हूं
मैं कागज़ पे अल्फ़ाज़ नहीं मय के जाम लिखता हूं।।




Zindagi Jee Rahe To Maut Se Inkar Mat Karna- Hindi Kavita By Ashish Awasthi

जिंदगी जी रहे तो मौत से इंकार मत करना
चाहते चलो सबको पर खुद को बेक़रार मत करना

जेब बड़ी हो जाये अच्छा ही है ये तो
ज़मीर भूल के फरेब का इख़्तियार मत करना

सबसे मिलो, हँसो और बातें करो
पर भूले से भी किसी का ऐतबार मत करना

प्यार बेहिचक बांटते रहो दुनिया में
किसी मासूम का कभी शिकार मत करना

कोई रोक दे तुमको तो और बात है
खुद की नेकी से कभी इंकार मत करना

जिस ओर जाने को मना किया था माँ ने
उस रस्ते को कभी पार मत करना ।।